9. अश्मनवती रीयते

अश्मनवती रीयते

नदिया धारा बीती जाए,

कंकड़ और पत्थरों वाली।

चुभने वाले नुकीले कंकड़,

चिकने फिसलने वाले पत्थर ।

कैसे जाएँ पार इसके,

हम एकाकी बेसहारे । नदिया—

आओ बंधु दो सहारा,

हाथ पकड़ कर हम परस्पर,

पैर दृढ़ता से जमा कर,

मिलकर अपने कदम बढ़ावें । नदिया—

जब पहुंचें मंझधार में साथी,

नदिया गहरी होती जाए,

बोझा सारा इसी तट पर रख दो,

हलके हो कर तैर लो इसको । नदिया—

पार इसके हम पहुँच कर,

उठा लें सुन्दर रत्न चमकते,

जिनकी आभा से मग हो आलोकित,

आनंद नगरी की डगर दिखे । नदिया—

-कमला मायर

Scroll to Top