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Dr. Kamala Mair, PhD (1918-1998)

First Principal of D.A.V. College for Girls, Yamunanagar

Poet, author, philosopher, Vedic scholar, classical musician, and advocate for women's empowerment

"Mrs Mair's writings are reminiscent of the Sufi tradition in which the yearning of the soul for the Divine is a recurrent theme. Her deeply devotional lyrics profoundly capture the "birha" she experienced.
Having lived a full life, her compass is now focused on the path that will lead her home. Tears well up in my eyes when I read her poetry. It resonates deep within my being where a similar longing lurks."

-Jessi Kaur
California-based author and spiritual speaker

side-mair

अग्नि आयाहि वीतये गृणाणो हव्यदातये। सामवेद

Dr. Kamala Mair's Thoughts and Philosophies

Philosophy had been Dr. Mair's favorite subject in college, and the interest deepened with time. In fact, her writings discovered 22 years after her death reveal that during the last year of her life, she was writing a book titled "A Comparative Study of Western and Eastern Philosophy", and had already written 100+ pages.

Pictures: The book on philosophy (L) and some of Dr. Mair's writings being recovered (R)

Some of these thoughts were found scribbled on scraps, hence not to be considered final drafts (More to be posted)

"Thorny paths and murky roads have never deterred those who are determined to experience the 'Anand' by treading the path shown by our sages towards attaining 'Moksha'."

"A twinkling of an eye seems to push the present into the past and to pull the future into the present. The gap between the old and new becomes mythical. Every fraction of a second has its value for those who want to make the best of life, who labour hard to find diamonds from digging the earth."

"A life full of worldly worries and pleasures only is such an abode where deities hesitate and devils hate to enter."

"One gentle smile of a white jasmine flower in the early hours of morning reminds humans to have a spotlessly clean heart and to do noble deeds, which will spread their fragrance over miles."

"A man's beliefs based on judgment and conviction, if put into practice may build a huge edifice wherein an image of virtue and righteousness can be clearly perceived."

"Lives of great men, sages were rarely accompanied by favorable circumstances. They touched the highest step of the ladder by perseverance and hard labour, pushing aside thorns and stones coming in their way. Even to make life a bed of roses, we have to reach the beautiful flower through thorns."

"Walking only is not enough to reach the goal. We may go on walking for hours, days, and yet the goal may appear to be further and further. Determination, walking with a strong foot and firm steps, knowledge of the right path and the right direction are things to be borne in mind, without which walking indefinitely makes the whole attempt futile."

"Turning imagination into action does not depend on stars above, but on our own shoulders."

"A tiny hut in the midst of a forest, surrounded by colorful flowerbeds with bees buzzing over them, a narrow stream flowing nearby, a hilly spring washing stones and pebbles, sprinkling tiny sparkling drops may produce many a lover of wisdom who can enlighten innumerable minds through their knowledge, wisdom, and experience."

"Life devoid of love for fellow humans is unworthy of living and is rightly described as a grand error of human behavior."

 

यज्ञ

“यज्ञ एक महान कर्म है। सब कर्मों से अधिक यज्ञ की श्रेष्ठता बताई गई है। 'यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म' कहा गया है। यज्ञ में डिवॉन का आह्वान, इदन्नमम की भावना से आहूति अर्पण, दान-वेद ज्ञान का दान, यह यज्ञ के आवश्यक अंग हैं। जो मनुष्य अपने जीवन यज्ञ में उपर्युक्त बातों का सर्वदा समावेश करता है, वह श्रेष्ठ है।“

क्षुधा

“भोजन की क्षुधा की तृप्ति के बिना पर्याप्त समय तक रहा जा सकता है- किन्तु प्रभु की असीम प्रभु दर्शन की तीव्र क्षुधा, प्रभु प्रेम की पिपासा, मानव को शीघ्र व्याकुल कर देती है। ऐसा उन्ही व्यक्तियों में हो पाता है जो प्रभु की असीम शक्ति एवं वात्सल्य में दृढ़ विशवास रखते हैं। न्यायकारी, अन्तर्यामी प्रभु साधक/उपासक की निष्ठां एवं सत्यता, दृढ़ता एवं त्याग को देखकर ही उसका वरण अपनी कृपा द्वारा करते हैं।“

अहंकार

“अहंकार एक ऐसा सागर है जिसमें मनुष्य के सब शुभ कर्म डूब जाते हैं। अहंकार का दानव मनुष्य के सत्कर्मों को एक क्षण में खा जाता है। उसका खाद्य ही शुभ कर्म है। सैंकड़ों वर्षों की तपस्या भी अहंकार के आ जाने से विफल हो जाती है।“

सत्संग

“क्षण भर का सत्संग भी मनुष्य के जीवन को बदलकर उसके आचरण को सदैव उन्नति की ओर ले जाने में समर्थ होता है। भाग्यशाली वे हैं जिनको जीवन में सज्जनों का संग प्राप्त होता है- जिस प्रकार सुंगधियुक्त पदार्थों के संयोग से उठे धूंए की स्वाभाविक करड़वाहट सुगन्धि में परिवर्तित हो जाती है - उसी प्रकार सज्जनों के संग से, सत्संग से व्यक्तियों के दुर्गुण नष्ट हो कर सद्गुणों का आकार  लेते हैं। धरती पर पड़ी धूल पवन के संसर्ग से चलने वाले पथिकों के पैर की धूल रूपी तिरस्कार को छोड़कर आकाश में उड़ने लगती है- सत्संग में गिरे हुओं को ऊंचा उठाने की सामर्थ्य होती है। प्रतिदिन थोड़ी सी देर का सत्संग मनुष्य की आत्मोन्नति का एक अच्छा साधन है।“

सुमिरन

“प्रभु स्मरण बिना जीवन खोखला एवं निराधार है। परमेश्वर 'देव सविता' है, अर्थात वह, जन्मदाता, पालनकर्त्ता, रक्षक, सत्प्रेरक एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न है। उसके सान्निध्य का अनुभव किये बिना किसी कार्य को कर पाना बिना आधार के गगन में लटकने के सामान है।“

“संकट की स्थिति में ही मनुष्य के संचित कर्मों एवं मानसिक संतुलन का रूप परिलक्षित होता है।“

“मानव शरीर से जब आत्म तत्व का विच्छेद हो जाता है तो वह शरीर अपने भौतिक नाम को भी छोड़ देता है- वह व्यक्ति वाचक न रह कर जातिवाचक हो जाता है।“

“निर्जीव शरीर के पास बैठकर आंसू बहाना एक स्वाभाविक कर्म होते हुए भी लौकिकता तक ही सीमित रहता है, सजीव की व्यथा पर आंसू बहाना एक सच्चे सहृदय की पहचान है।“

“वर्तमान समय में शरीर को स्वस्थ एवं सुन्दर बनाने के साधनों के विज्ञापनों की भरमार है। यदि उसके साथ ही चारित्रिक सौंदर्य एवं आत्मिक उन्नति के साधनों का प्रचार भी हो जाता तो 'सत्यं, शिवं, सुन्दरं' साक्षात रूप धारण कर हमारे समक्ष आ खड़े होते।“

“मनुष्य के व्यवहार एवं वाणी द्वारा की गई हिंसा का प्रभाव तीक्ष्ण से तीक्ष्ण पैने शास्त्रों द्वारा की गई हिंसा से कहीं अधिक घातक होता है।“

“हम सूर्य और चन्द्रमा की भांति कल्याणकारी मार्ग पर चलते हुए, दान की भावना, त्याग और परोपकार की भावना से पूर्ण हो कर ज्ञानियों का संसर्ग पाकर अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखते हुए दीर्घायु प्राप्त करें। इस प्रकार के जीवन से हम अपने मानव कल्याण के लक्ष्य को पूरा कर अपने जीवन को सफल बना सकेंगे।“

“शुद्धाचरण वाले, सुशिक्षित एवं सच्चरित्र माता पिता की संतान एवं इसी प्रकार के आचार्यों एवं गुरुओं के शिष्य जीवन में उत्कर्ष को प्राप्त होकर, मात्रिमान, पितृमान, आचार्यवान, पुरुषवेद की उक्ति को चरितार्थ कर सकते हैं।“

“जीवन के यथार्थ एवं सत्य की खोज करने वाले के लिए इस जाता धरती पर अपने पाँव जमा कर, इसके कंकड़, पत्थर एवं काँटों पर चलकर उनको रौंदने का अभ्यास करना आवश्यक है।“

“मनुष्य परमात्मा की श्रेष्ठ कृति है। आहार, निद्रा, भय, मनुष्य एवं अन्य प्राणियों में पाए जाते हैं, परन्तु मनुष्य को इश्वर ने बुद्धि भी दी है। प्रभु की प्रेरणा है के हे मानव तुझे मैंने बुद्धि दी है जिससे की तू मेरा स्मरण कर सकता है और मेरे समीप आने का प्रयत्न कर सकता है।“

“कर्तव्य कर्मों का आचरण करते हुए प्रभु स्मरण करते रहना मनुष्य के लिए सफलता के मार्ग को प्रशस्त करता है।“

“यदि सौ वरह की तपस्या का फल और भगवत्कृपा दोनों में से एक का याचन करना हो तो भगवत्कृपा ही श्रेष्ठतर है।“

“वेद सूर्य के समान जाज्ज्वल्यमान एवं अक्षय ज्ञान अपने आप में समेटे हुए है, उनकी ज्योति कभी मंद नहीं पड़ती, उनके दीपक का स्नेह कभी चुकता नहीं। वे जग जीवन के लिए सूर्य की भांति जीवन दायिनी शक्ति के स्रोत होते हैं। सृष्टि के साथ ही उन्होंने समस्त विश्व ब्रह्माण्ड के प्रत्येक पदार्थ को अपने चिंतन का विषय बनाया। अपूर्व ज्ञान से भरपूर ये ज्ञान के महासिंधु सदा सदा से अपना स्वरुप अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इसमें उठने वाली तरंगों के लघु बिंदु भी मानव कल्याण करने में समर्थ हैं।“

“दुःख कष्ट, शारीरिक हो या मानसिक, मनुष्य को एक बार झकझोर कर उसको वास्तविकता के धरातल पर पर ला खड़ा कर देता है। इसके विपरीत  सुख एक ऐसी अनुभूति है जो, भूतकाल को भुलाकर भविष्य की कल्पना से विमुख कर के मानव को मात्र वर्तमान को ही सब कुछ समझने को बाध्य कर देती है। यह स्थिति मनुष्य में प्रमाद एवं   आलस्य को जन्म देती है- यहीं से मानव का ह्यास आरम्भ हो जाता है। दुःख मानव के मानस पटल पर अभिलाषाओं के अम्बार लगा देता है- सक्रियता, स्फूर्ति, शारीरिक एवं मानसिक, उसकी एक अनूठी विशेषता है। मानव मन में ईशभक्ति का स्फुरण करने की सामर्थ्य सुख की अपेक्षा दुखद स्थिति में अधिक होती है।“

“मित भाषिता से चिंतन शक्ति के विकास में सहायता मिलती है, चिंतन से विवेक बुद्धि विक्सित होती है। विवेकी व्यक्ति अपने व्यवहार से सदैव संयत एवं संतुलित रहता है।“

“अवसाद के वै क्षण अत्यंत मधुर एवं मूल्यवानहो ते हैं जो की मनुष्य को आध्यात्मिकता, प्रभु विश्वास एवं भक्ति की ओर अग्रसर करते हैं।“

“जग को हास ही प्रिय है, वह बहारों के राग को ही सुनना चाहता है, कजरी की टीस भरी पुकार उसके कानों में काँटों की भांति चुभने लगती है। परन्तु जीवन के रंग बिरंगे अनुभवों का जिसने भरपूर आनंद लिया है, वह कभी कभी किसी के श्वासों के साथ उसके उच्छ्वासों का स्वर सुनने के लिए पल भर रुक कर अपने भावों की दिशा बदल देता है।“

“जिस समय अंधेरी रात हो, बादलों का घोट गंजन हो रहा हो, हिंसक पशु वन में दहाड़ रहे हों- उनके गर्जन से ह्रदय कम्पायमान हो रहा हो- घने वृक्षों की छाया तिमिर को गहनतर बना रही हो- उस समय श्यामल धरती की पगडंडी की क्षीण उजली सी रेखा ही भटके पथिक का मार्ग दर्शन करती है। उस पर चलता हुआ पथिक निरंतर आगे बढ़ता हुआ, भोर होते होते अपने गंतव्य के निकट पर पहुँच कर सुख की सांस लेता है।“

“मन के विचार एक वेगवती धारा के सामान हैं जो अपने थपेड़ों से कभी उसे एकदम झकझोर कर रख देते हैं, और सहसा दृष्टि का वर्ण बदल जाता है।“

“जीवन यात्रा में प्रभात, मध्यान्ह, संध्या का आगमन यथा समय होता है, फिर निशा के अन्धकार का आक्रमण निश्चेष्ट हो कर सो जाने का सन्देश देता है। उस चिर निद्रा का विश्राम पुनः जीवन धारण करके नए जन्म का, नई प्रभात की नव किरणों को प्राप्त करने की प्रतीक्षा करता है।“

“जगती तल के दीर्घ पथ का पथिक चला जा रहा है- मन में एक सुन्दर आशा लिए-अभिलाषा लिए - कभी वह क्लांत हो रुक जाता है- मस्तक पर मोती से श्वेत कण झलकने लगते हैं- वह पीछे घूम कर देखा है- इस इस दीर्घ पथ के वे अनेक पथिक  बहुत पीछे रह गए हैं- उनकी छाया मात्र का आभास पाना भी असंभव प्रतीत होता है- परन्तु वह निरंतर चला जा रहा है 'हे अन्तः शक्ति वहां पहुंचा दो - क्षितिज के उस पार- जहां एक सुन्दर नगरी बसी है, सुनहली- दीप्तिमान। जहां के नदी, निर्झर, वृक्ष, पक्षी, 'अंत' एवं 'विनाश' जैसे शब्दों से अपरिचित हैं। पथिक जग के इस नश्वर तल को छोड़ने के प्रयत्न में आगे आगे उस स्वर्णिम बस्ती की ओर डग भरता चला जा रहा है- किन्तु सोचता जाता है, कहीं संसृति की अस्थिरता उसके जीवन को वेदनामय  बना कर न छोड़ दे।“

“सामने अपार जल राशि से पूर्ण पारावार में भगवान् भास्कर को प्रत्यक्ष डूबते देखता है। सहसा पार से आने वाला झंझावात का झोंका सा उसे झकझोर देता है- मानो उसके कान में कह रहा हो- 'पथिक तुम्हे सोये बहुत विलम्ब हुआ- उठो देखो वह स्वर्ण का संसार, पक्षियों का अक्षय कलरव, सतत प्रवाहित होने वाले निर्झर का अमर संगीत एक स्वप्न से विलीन हो गए हैं।“

“नियमित रूप से मर्यादाओं का पालन करते हुए उत्तम कर्मों को करते जाना मानव-व्यवहार में  अनुशासन लाता है। यज्ञादि पावन कर्मों को शास्त्रविहित मर्यादाओं सहित करना मानव के स्वभाव में न केवल आह्रादपूर्ण स्थिति उत्पन्न करता, वरन् उसके समग्र व्यवहार में मर्यादा एवं अनुशासन की प्रतिष्ठा करता है।“

“मानव की हर सफलता के पीछे उस दिव्य सत्ता के हाथ छुपे रहते हैं जिनका स्पर्श प्रत्येक कार्य को दिशा प्रदान करता है। उस सूक्ष्म एवं कोमल स्पर्श की अनुभूति के लिए तनिक, जग की जगमगाती चौँध से मुंह फेर कर, पल भर आँख मूँद कर, अपने अहं को भुला देना सर्वोत्तम उपाय है।“

“यश प्राप्ति के लिए भाषा की आवश्यकता नहीं होती - मनुष्य के कृत्य ही उसका यश फैलाने के निश्चित साधन हैं।“

“प्रतिपल सुमिरन करते रहने से मन में अभद्र भाव प्रवेश नहीं कर पाते। इश्वर भक्ति के लिए सुमिरन प्रथम सोपान है। दीनों का दयालु,करुणा का सागर, वात्सल्य का भण्डार वह प्रभु सब दुखों को दूर रखने वाला सब सुखों का प्रदाता है।“

-Kamala mair

Copyright, 2021, Manjula Mair Gupta, manjulagupta@hotmail.com

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