88. प्रतीक्षा-स्वागत-प्रयाण
- प्रतीक्षा – स्वागत – प्रयाण
Written by Dr. Kamala Mair on her 77th birthday (March 1st, 1995)
प्रतीक्षा – है उस समय की जब बाहर जाने वाली सांस भीतर लौटने की प्रतीक्षा ही करती रह जाएगी।
स्वागत – है उन क्षणों का जब हथेली पर रखा दीपक एक दिव्य सी ज्योति दिखाकर आगे के मार्ग को आलोकित करेगा।
प्रयाण – लो आ गई घड़ी प्रयाण की
लो आ गई घड़ी प्रयाण की
श्वासों को गिनते गिनते अब
प्राण थक चुके हैं
कितने रहे हैं शेष श्वास
अब कब होंगे वे पूरे,
जब खाली सी धौंकनी
हल्की हो उड़ने को व्यग्र हो उठेगी?
(यह प्रश्न चिन्ह हर खापकती पालक के सामने चित्रित हो उठता है )
लो आ गई घड़ी प्रयाण की
प्रथम दर्श पाते ही भानु का
चुपचाप, छुपकर, उसी क्षण
ये चिमट गई तन से
दिवस बीते, मास बीते,
बीते वर्षों के दशक के दशक,
साँसों के अगणित क्षणों ने, बटोरा
जग का समस्त सौरभ, मानो
विकीर्ण करने इसी भूमि तल पर
कुछ कुछ लपेट, बाँध कर
प्रतीक्षा कर रहे हैं, दूर से जो
आती सवारी दिख रही, (स्वागत है उसका)
लो आ गई घड़ी प्रयाण की
लो आ गई घड़ी प्रयाण की
-कमला मायर
March 1st, 1995
77th birthday