21. दासी हूँ
दासी हूँ
दासी हूँ प्रभु आपकी,
चरण शरण में रख लीजे,
तुमरे सिवा न कोई सहारा,
अपनी शरण में रख लीजे।
युग युग बीते भटकते मुझ को ,
नहीं कहीं आराम मिला।
शीघ्र दया का हाथ बढ़ा दो,
डूबी जाती मंझधार में।।
राग द्वेष और अनेक शत्रुओं ने,
घेरा मुझको चारों तरफ़ से।
तीनों ताप तपा रहे हैं,
जीवन बीता जा रहा है।।
एक दृष्टि करुणा की देखो,
हो जाऊं बस पार मैं।।
दीन के बंधू नाम तुम्हारा,
सुन के आई शरण तेरी
तू अधमों का तारनहारा,
उठाता है इक बार में।।
-कमला मायर