22. तन्मेमनः शिव संकल्पस्तु

तन्मेमनः शिव संकल्पस्तु

दूर दूर भागा जाता मन, रैन दिना यह चैन न पावे,

दिव्य ज्योति का है जो प्रकाशक, वो मन शिव संकल्पी होवे।

जिससे कर्मनिष्ठ और धीर मुनि यज्ञ कर्म को करते हैं,

विलक्षण अद्भुत प्रजाओं का स्वामी वो मन शिव संकल्पी होवे।

उच्च ज्ञान का देने वाला, भक्तों के मन में सदा ही जगता,

जिसके बिना कोई कर्म न होवे, वो मन शिव संकल्पी होवे।

योगी तीन काल को इससे जानें, उन्हें ईश के साथ मिलाता,

योग यज्ञ का वर्धक विज्ञानी, वह मन शिव संकल्पी होवे।

रथ में वेद के धुरा बना, सर्वज्ञ चेतन ईश जिसमें समाया,

नाश अविद्या का कर के, वह मन शिव संकल्पी होवे।

उत्तम सारथि अश्वनियन्ता चतुर्दिक रथ को चलाने वाला,

अजर तीव्रगामी हृदवासी, वो मन शिव संकल्पी होवे।

-कमला मायर

 

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