36. क्षोभ

क्षोभ-

कोकिल आ, गा पंचम का स्वर,

देख धरती के तन पर फिर,

बसंत छा रहा है।

गा जितना गा सके, गा,

कुछ काल में ग्रीश का आतप,

इन हरे भरे तरुओं के

रास्रीक्त पल्लवों का रस सूखा कर,

उन्हें भूमि पर बिखेर देगा,

और

ये पीत वर्ण उदास चेहरा ले कर,

इधर से उधर उड़ते रहेंगे।

कोकिल गा,

तेरे स्वरों के मधुकण ही,

शायद नव तरु कोंपलों एवं सुमनों में,

नव रस करेंगे सिंचित,

जग पान कर उस मधु को

जीवन भर गा सकेगा

सुख के मधुर गीत।

-कमला मायर

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