38. विचार वेग

विचार वेग-

विचार वेग ने

मानस तल को झकझोड़ा

उठो,

यहां पड़े क्या करते हो?

क्या उषा की लालिमा

तुम्हारे नेत्र तक नहीं पहुँची?

क्या दिनकर के करों की उश्णता

ने तुम्हे नहीं हिलाया?

क्या इसी तरह

धरती पर पड़े रह कर

आकाश को छूने का स्वप्न पूरा हो सकेगा?

नहीं, उठो

विज्ञान चाँद पर चरण टिका चुका है

तुम उठ कर वायुयान में ही बैठ लो

धरती का भार कुछ देर के लिए तो हल्का होने दो।

उठो, देखो,

पान टेल की हरी दूब

जो तुम्हारे पड़े रहने से

पीली पड़ चुकी है

उसे सांस लेने दो

हरा होने दो

(मन के विचार एक वेगवती धारा के सामान हैं जो अपने थपेड़ों से कभी उसे एकदम झकझोर कर रख देते हैं, और सहसा दृष्टि बिंदु का वर्णन बदल जाता है।)

-कमला मायर