51. सब पा कर भी
सब पा कर भी-
सब पा कर भी जग में
प्राणी अधूरा नाम बिना।
बादल हैं गरजते ज्यों नभ में,
पर हैं रीते वह वारि बिना। सब
वन भरे-पुरे तरुवरों से,
पर व्यर्थ हैं वे भी फल के बिना।
ऐसे ही जीते तो हैं प्राणी,
पर व्यर्थ है जीवन नाम बिना। सब
दिन रात किया करते जो भजन,
पर व्यर्थ हो श्रद्धा के बिना।
धरती पर चल कर जाने वाले,
जन्म गंवाते प्रभु नाम बिना। सब
मनुष्य, मनुष्य पे करते हिंसा,
आयु बिताते उपकार बिना।
जन्म जन्म पर तप करके भी,
प्रभु कृपा न पाते त्याग बिना। सब
-कमला मायर