52. हे ईश

हे ईश-

हे ईश हम सब मिलके, तुमको ही नित ध्यावें,

मिल के बैठे हम सब, और गीत तुम्हारी गावें।  हे ईश

दाता हो सब जगत के, अन्न धन और सुखः के,

उपकारों को तुम्हारे, कोई गिन कभी न पाए।  हे ईश

भण्डार तुम्हारी पूर्ण रहते सदा सदा ही,

कितना ही देते जाते, चुकने कभी न पाएं।  हे ईश,

अल्पज्ञ हम अज्ञानी, तुम्हारी कृपा न मानें,

अपने अहं के मारेम दुःख नित्य पाते जावें।  हे ईश

जग के प्रलोभनों से चमकती हुई ये धरती,

तुम्हारे ऐश्वर्य का सुख उठाने कभी न देती।

भाग्य अपने को कोसते, जीवन बिता दें सारा,

पर ज्ञान चक्षुओं की ज्योति से देख कुछ न पायें।  हे ईश

हे ईश खोल दो ज्ञान से भरा वो दीपक,

जिससे हम भद्र देखें, दर्शन तुम्हारी पायें।  हे ईश

-कमला मायर

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