55. आस लगी

आस लगी-

अब तो आस लगी प्रभु दर्शन की, दर्शन की,

दर्शन की, लगन लगी प्रभु सुमिरन की।

निश दिन तरसूं कब हो दूर मन काअँधेरा,

छिन-छिन पल-पल देखूं, कब होगा सवेरा।

दिन पर दिन बीते, आस करूं प्रभु दर्शन की,

रात अंधेरी कब बीते, आस करूं प्रभु दर्शन की।। अब तो

मन से कभी मैं न उसको विसारूं,

उसकी महिमा के गुण नित गाऊं,

गुण इतने मैं गिन नहीं पाऊं,

आस लिए बैठूं प्रभु दर्शन की, प्रभु दर्शन की।। अब तो

तारे चाहे गिनलो गगन के,

बिंदु बिंदु गिन लो चाहे सिंधु के,

गुण गिन न पाओ उस परम प्रभु के,

कितने अक्षर जोड़ूँ, राग बनाऊं,

गिन गिन घड़ियाँ देखूं, कब पाऊं छवि प्रभु की,

प्रभु दर्शन की।।

-कमला मायर

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