56. सारी पोथी ढूंढी
सारी पोथी ढूंढी-
सारी पोथी ढूंढी, सारे गीत ढूंढे,
सारे उपवन छाने, सारे सुमन देखे,
समझ न आवे कौन सा अक्षर
कौन सा स्वर, कौन सा पुष्प लेकर
अपने प्रभु को रिझाऊं।
मन को बुहारूं, तन को धोऊं,
भ्रम से दूर मैं रहना चाहूँ,
वेद ज्ञान के अक्षर लेकर
नाम उचारूं प्रतिपल मुख से
तभी मैं उसका मार्ग पाऊं।
दिन भी सुमिरूँ, रेन भी सुमिरूँ,
थकूं कभी न ध्याते ध्याते,
जिह्वा थके न नाम को रटते,
मन बन जाए नाम की माला,
वही माला मैं उसे पहनाऊं।
नाम सुमिरन है, रतन अमोलक,
रटते रटते, दिन बने रात, रात बने दिन,
अगणित मालाएं बनती जाएं,
उन मनकों की ज्योति जगमग,
उसमें देखूं मग, सबको दिखलाऊँ।
-कमला मायर