57. मावस का तम
(Incomplete version)
मावस का तम-
मावस का तम छाया हो नभ पर,
घनघोर घटाओं से भरा हो गगन,
तब मानस की कुटिया में,
एक मंद सा दीप जला करता है। मावस
चाहे कितने दीप जलें श्यामल नभ पर
चाहे कितनी हों रजत रश्मियाँ,
चाहे कितनी चलें आंधियां,
वह दीप सदा जलता रहता है। मावस
मावस ही क्यों, चाहे कितने
रवि के फैले हस्त जगती पर,
तम के कण कण धो दें स्वर्ण से
वह दीप सदा जलता रहता है। मावस
उस डीप की ज्योति न पड़े क्षीण,
चाहे स्वर्ण ज्योति से भरा हो अम्बर,
रवि के, विधु के, नक्षत्रों के अलोक से,
वह दीप सदा जलता रहता है। मावस
-कमला मायर