63. जीवन लेखा

जीवन लेखा-

दिन भी बीते, रैन भी बीती,

दिवस मास और वर्ष बीते,

प्रात बीती, दोपहर बीती

सन्धया बीती, आई फिर रजनी।

आओ लेखा करें समय का,

क्या पाया जग से जीवन में,

और क्या दिया जग को

कहीं बीत न जाये अंधेरी रजनी। दिन भी

बालापन तो अनजाने बीता,

यौवन जाने अनजाने बीता,

सन्धया तीसरे प्रहर का सन्देश लाई,

चौथेपन फिर आई श्याम रजनी। दिन भी

बालापन की किलकारी गूँजी,

यौवन मद से छूलक चला,

तीसरा चरण विचार में बीता,

चौथेपन पछताये रजनी। दिन भी

आओ मिल कर बैठें सोचें,

प्रभु ने क्यों दी थी ये सुन्दर काया

क्यों था भेजा इस भूपर

काया ही क्यों, दिया सुन्दर मन, और सुन्दर बुद्धि,

इसको लगाया कहाँ कहाँ पर,

सोचो तो, कहीं बीत न जाये रजनी- दिन भी

-कमला मायर

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