83. ईश दर्शन आस

ईश दर्शन आस-

हे ईश तेरे दर्शन की मुझे कबसे आस लगी है,

दो नयन कटोरे भर दो, उन्हें कबसे प्यास लगी है। हे ईश

दिन चढ़ता है और बढ़ता, फिर लाली दे के चला जाता,

जीवन के दिनकर को, प्रभात की आस लगी है। हे ईश

संध्या की रोली मिट मिट कर, बन जाती रेन अंधेरी,

तारों को गिनते गिनते, उसे भोर की आस लगी है। हे ईश

हैं मेरे नयन व्याकुल, मन में चीत्कार मची है,

इन चातकों को तो निशदिन, पावस की आग लगी है। हे ईश

पीने को स्वाति का अमृत, मन बन गया है अब वो पपीहा,

दो बिन्दु अमृत के दे दो, इनकी ही प्यास लगी है। हे ईश

-कमला मायर

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