84. जनम वृथा गंवाया

जनम वृथा गंवाया-

प्रभु के चरणों से हटाकर, विषयों में मन लगाया,

अपने जनम को, जग में वृथा गंवाया।

कञ्चन सी देहया पाकर, इसे रखा न शुद्ध तूने,

दागों और धब्बों से ही दूषित कर दी काया। प्रभु

बुद्धि के धन को पा कर, धर्म न कभी कमाया,

इस मूल धन से मानव, पुण्य कोई न कमाया। प्रभु

दूरितों की गाँठ (गठरी) ले कर, चढ़ने चला मंज़िल पर,

दिन दिन वो बनती भारी, नीचे तुझे गिराया। प्रभु

आया कहाँ से मानव, जाने का लक्ष्य भूला,

आँखों की ज्योति खो कर, मार्ग न सीधा पाया। प्रभु

प्रभु की शरण न बैठे, कभी याचना करी न,

कैसे दया करें वो, क्यों दे वो अपनी छाया। प्रभु

-कमला मायर

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