87. खिलखिलाता फूल

खिलखिलाता फूल- (Found scribbled on a scrap of paper)

मैं पूछूं कली कली से

जब खिल कर गिर जाओ

तुम्हारी महक का क्या होगा

मैं पूछूं कली कली से-

मैं पूछूं डाली डाली से

जब पतझड़ आएगी

तो तुम्हारे रस का क्या होगा

मैं पूछूं डाली डाली से-

मैं पूछूं पत्ते पत्ते से

जब वायु तुम्हें उड़ा देगी

तो तुम्हारे रंग का क्या होगा

मैं पूछूं पत्ते पत्ते से-

मैंने पूछा एक पुष्प से

तुम खिल खिल कर क्यों हँसते हो

वो बोला, खिल कर,

हार में पिरोया जाऊंगा

और प्रभु के चरण सजाऊंगा

चरणों की धुल बन के-

मैंने सोचा तब मन में

डाली और पत्तों के बीच

बन कर कली जो फूटा

वो पुष्प बना हँसता खिलता,

भाग्य बड़े हैं उसके

जो प्रभु चरणों के स्पर्शस होगा

-कमला मायर

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