4. ऋषि दयानन्द गीत
ऋषि गीत
अजब सूर्य निकला चमकता गगन पर
निशा भागी ले करके चादर काली
पर्दा भरम का उठ गया जग से
देख के छाई सुन्दर लाली
अजब —
घटाटोप छाया था घोर अँधेरा
घनी नींद सोये थे हम होश खो कर
वेद की वीणा की टंकार देकर
ऋषि ने दी हमें ज़िन्दगी निराली
अजब—
भूले थे यज्ञ और वेद की वाणी
भुलाया था हमने सद्ज्ञान तप को
मन्त्रों की भेरी बजा कर ऋषिवर ने
भ्रान्ति थी सबके मन से निकली
अजब—
कंकड़ पत्थरों से घायल होता
ज़हरों से अपनी प्यास बुझाता
ओम ध्वज फहराता चला जा रहा था
वेद की ज्योति से करके उजाली
अजब—
ऐसे ऋषि को हम कैसे भूलें
जिसने पिलाया जीवन का अमृत
गिरों को उठाना यही प्रण था उसका
इसी की पताका थी उसने उथली
अजब—
शिवरात्रि को जग, कभी फिर न सोया
जगत को जगाने की थी उसने ठानी
प्रभु आज्ञा पाकर अमर नींद सोया
बनाकर अमावस को चमकती दिवाली
अजब—
-कमला मायर