12. वंदना 2
वंदना 2
ऐसा वर दो प्रभु हमें नित्य तुम्हारे गुण गायें,
मन मंदिर को निर्मल करके तेरी प्रतिमा बिठलायें —
काम क्रोध से बचें हमेशा, राग द्वेष से भागें दूर,
लोभ मोह को त्यागें, निरंतर चरण तुम्हारे ही ध्यायें—
अन्धकार अज्ञान मिटाकर ज्ञान की ज्योति फैलाएं,
ज्ञानी बनकर मान बढ़ाएं नाम तुम्हारा नित गायें—
भ्रान्ति अशिक्षा से बचकर निश्चय बुद्धि को हम बढ़ाएं,
दुर्गुण दुर्व्यसनों को तजकर सन्मार्ग सदा ही अपनाएं—
यज्ञ करें सब मिलकर प्रतिदिन जीवन ही यज्ञ बनाएं,
परोपकार परस्पर प्रीति करुणा हृदय में बढ़ाएं—
दीन दुःखी असहाय मिले तो लम्बे हाथ बढ़ाएं,
तन मन धन से करके सेवा, दुखिया गले लगाएं—
प्रेम प्रीति मन में उपजा कर मैत्री भाव बढ़ाएं,
उंच नीच का भेद मिटा कर समता मन में लाएं—
-कमला मायर