17. मन की हूक
मन की हूक
मन में मेरे हूक उठती है प्रभु गुणगान करने के लिए,
प्रभु का दर्श पाने के लिए।
अँधेरा चारों ओर फैला, मन में भी है उसका काजल सा काला,
न जाने कब निशा बीते, भोर के तारे उगें जमेगी कब देन ज्योति वाडिग कब।
तारें टूटै सब पड़ी हैं -राग सोये सोये से हैं,
मेरी वीणा तड़पती है हरि का राग गाने के लिए।
जिह्वा में भी मधु नहीं है- कैसे तेरा नाम गाऊं,
कंठ में भी स्वर नहीं हैं तेरा नाम गाने को।
अश्रु भर भर नेत्र मेरे बन गए धुंधले समुन्दर,
तेरी मूरत आ भी जाए – कैसे देखूं मैं पहचान करूँ मैं।
दिन भी बीते, वर्ष बीते, बीतते जाते युग, युग,
प्राण आए कंठ को – अब तक न आया नाम मुंह पर।
करुणा सिंधु करके करुणा फूंक दो इसमें प्राणों के स्वर,
नाम गाऊं तेरा हर दम- गूँज उठे आकाश मंडल।
-कमला मायर