23. गीत, मानव-जन्म
गीत, मानव-जन्म
पाकर मानव जन्म ऐ बन्दे तूने अब तक क्या किया,
इसका लेखा करने को तू क्षण भर ध्यान लगा ले—
कहाँ से आया, क्या करने, कहाँ को जाएगा,
इसका लेखा करने को ——–
बचपन खेल कूद में बीता, यौवन ऐश आराम में,
अब तो समय है ऐ मानव अपने को पहचान ले,
इस का लेखा करने को——-
दिन भर काया को सजाया, इसको हृष्ट और पुष्ट बनाया,
इसी लोक का रूप संवारा, दूजा लोक न ध्याया,
इस का लेखा करने को ———
क्षण भर बाहर से मुड़ कर भीतर के जग को तू देख,
दूर अँधेरा हो जाएगा, अंतर्ज्योति जगेगी,
इस का लेखा करने को ——-
बाहर के विषयों ने तुझे ज़ोर ज़ोर से पुकारा है,
अपने में लिपटाने को खूब राग रचाया है,
भीतर की पुकार को सुनके, क्षण भर ध्यान लगा ले—
बाहर झंझावात चला है, आंधी वर्षा बरस रही है,
सब ओर किया है अँधेरा इसने, मारग नहीं है दीखता,
सीधा मारग पा लेने को क्षण भर ध्यान लगा ले—–
-कमला मायर