27. अभिलाषा
अभिलाषा-
मेरा मन वह मंदिर बन जाये,
जिसमें बिठला दूँ प्रभु की मूरति,
स्फटिक सा वह उज्जवल हो जाये,
जिसमें देख सकूं वह छवि निर्मल।
अनुराग भरा एक दीपक उसमें रखकर,
जी भर देखूं उस अनुपम छवि को,
बाती का स्नेह न कभी चुक पाये,
नित नवल स्नेह भरती जाऊं।।
जब जब धूल लगे जमने उस पट पर,
दो नैनों का खार भरा जल लेकर,
धो कर उसको कर दूँ स्वच्छ निर्मल,
फिर फिर देखूं उस प्रतिमा को अंतर में,
जग उसको देख न पाये धरा पर।
मेरा मन माटी का दीपक बन जाये,
जो पान करे नित प्रेम सरल,
जिसमे तैरती टूल वर्तिका,
आलोकित कर दे वह रूप, छवि,
जिससे पा कर ताप, ज्योति,
जग पा ले लोचन का सुख।
वह आलोक विचित्र,
बन जाय पथिकों का मार्गदर्शक,
कंकड़, कंटक न रोक सकें,
उनका ऋजु पंथ तनिक।
-कमला मायर