29. ऋषि दयानन्द
ऋषि दयानन्द–
सोना चांदी बिखरा जगत में, पर हीरा मिलता कहीं, कहीं,
सागर में कितने सीप भरे, पर मोती मिलता कहीं कहीं।
यहां बड़े बड़े हैं भवन खरे, और ग्रंथों के अम्बार लगे,
पर ज्ञान है मिलता कहीं कहीं।
बगिया में फूल खिले कितने, पर मधु मिलता है कहीं कहीं।
जगह जगह पंडाल सजे, और उत्सवों की भरमार मची,
मंच भरे वक्ताओं से, भीड़ जमी सुनने प्रवचन।
पर सुवचन है मिलता कहीं कहीं।
युग युग से सूर्य चमकता है, जग का अन्धकार मिटाता है,
पर वेद प्रकाश फैलाने वाला विद्वान् है मिलता कहीं कहीं।
हिंसा और पाप बिछा जग में, पृथ्वी बोझ से कांप रही,
धरती मां पुकारे रो रो कर, कोई आओ और उद्धार करो,
कितने आए और चले गए, दयानन्द सा आया अभी नहीं।
-कमला मायर