30. प्रभु

प्रभु-

प्रभु तुम हो दाता हम हैं भिक्षुक,

दीनता दूर करो,

शरण तुम्हारी आन पड़े हैं

शीश में चरण धरो।

प्रभु—

झोली खाली ले कर आए,

कर के कृपा इस को भरो,

दीं के बन्धु नाम तुम्हारा,

सुन कर यह दर पकरो।

प्रभु—

हम से दीन न जग में कोई,

तुम से न कोई दीन दयाल,

तुम हो जग के अवढर दानी,

अब तो झोली भरो।

प्रभु—

तुम हो अन्तर्यामी प्रभु,

हम हैं अति अज्ञानी,

जप तप की विधि कुछ नहि जानें,

जानें न कोई निर्मल करनी,

ऐसी बुद्धि देदो प्रभु,

हम नित्य नाम सुमिरें।

प्रभु—

तुम नित्य दिया करते हो प्रभु,

तुम्हारे पूर्ण भण्डार सदा,

हम हैं स्वारथ में डूबे,

अपना ही उदर भरें,

पर उपकार न सेवा सुमिरन,

दुरित करते न डरो।

प्रभु—

-कमला मायर

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