37. दाता तुम हो

दाता तुम हो-

दाता तुम हो, विधाता तुम हो,

हम हैं तुम्हारे द्वार के याचक,

तुम्हारी कृपा से पांवें सब कुछ,

तुम ही हो हम सबके रक्षक।

दाता—

बल बुद्धि और ज्ञान के दाता,

घट घट के तुम ही हो ज्ञाता,

जानते अपने जान के दुःख को,

तुरंत ही बनते सबके रक्षक।

दाता—

जन  जो तुमको मन से ध्याते,

तुम्हारी कृपा के नित गुण गाते,

देख देख ऐश्वर्य तुम्हारा,

मानते तुमको दुःख विनाशक।

दाता—

भूले भटके दुखी जनों को,

सत्पथ तुम दिखलाते सदा,

श्रद्धा से जो आज्ञा में चलते,

वह न डरते भय-दानव से।

दाता—

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