41. विनती
विनती-
विनती है प्रभु इतनी सी मेरी,
अब मेरी नैया पार करो-
मंझधार में कब से घूम रही,
हाथ में अब पतवार धरो-
विनती—
घूम घूम के हार गई मैं,
विनय करूं मैं कब से तुम्हारी,
बता दो प्रभु कब दोगे बल,
कब मैं नदिया पार करों-
विनती—
बिन पतवार तर पाऊं न यहां से,
नदिया गहरी और जीवों भरी,
जब जब चाहूँ खेने नैय्या,
शक्ति बिना न आगे बढ़ूँ –
विनती—
जोर जोर से सबको पुकारूँ,
कौन सा खेवट पार करे,
कोई बता न पाये मुझको,
अंत तुम्हारे पाये पडूं –
विनती—
-कमला मायर