44. तेरी छवि

तेरी छवि

मैं तेरी ही छवि देखूं

क्षम से पीड़ित, छालों को सहलाती,

नीचे दबी हरी दूब देखूं

चाहे व्योम से झांकते दो लोचन देखूं,

पर मन कह उठता है

मानस के पट पर अंकित

मैं तेरी ही छवि देखूं

 

रजनी के तन पर सजते

झिलमिल रत्नों में भी

तेरी ही उज्ज्वल कान्ति दिखे

दिवस के नव वितान पर निकले रवि में

तेरा ही दीप्यमान रूप दिखे

चाहे यह सब प्रतिदिन देखूं

तेरी महिमा की गरिमा देखूं

पर

मानस के पट पर अंकित

तेरी ही छवि देखूं

 

चाहे

सरिता के निर्मल वारि में

निर्झर से झरते मुक्ता कण में

सागर के भीषण नाद में

तेरा ही निहित रूप देखूं

पर

मानस के पट पर अंकित

तेरी ही छवि देखूं

-कमला मायर

3rd Jan. 1997

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