58. जगत के स्वामी

जगत के स्वामी-

जगत के स्वामी परम पिता, तुम्हें प्रणाम बार बार,

शरण तुम्हारी आये सब, करते प्रणाम बार बार।।  जगत

सृष्टि रचाने वाले तुम, सबको चला रहे,

बिना तुम्हारे जग का है, कोई न आधार।। जगत

पर्वत, नदी और सिंधु में, हो रहे तुम ही विद्यमान,

जग पाता इन से अन्न-जल, कितना महान ये उपकार।।  जगत

सूर्य-चाँद, दिन और प्रात, तुमसे ज्योति पा रहे,

इतना प्रकाश आते ही, मिट जाता अन्धकार।  जगत

डाली और पत्तों में, फूलों में तुम ही रम रहे,

जगत के कोने कोने में, फैला हुआ तुम्हारा प्यार।  जगत

आँख उषा की खुलते ही, पक्षी गायें तेरा गान,

अद्भुत तेरी रचना का, है न कोई वार पार।

कैसे रिझायें हम तुम्हें, पायें कैसे तुम्हारा दर्श,

तुमको तो ढूंढते हुए, ऋषि मुनि भी गए हैं हार। जगत

-कमला मायर

 

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