59. सच कह दूँ?

‘सच कह दूँ? यदि बुरा न मानो’

 

सूरज के ढलते-ढलते दिन को भी ढलते देखा

सूरज के पीछे पीछे दिन को भी चलते देखा

सुबह भी चलते चलते थक कर, बन गई शाम मैली

सोने का जलता गोला ताम्बे का बनता देखा –

 

कली के चटकने से ही, महक उठी सब क्यारी

हँसते गुलाब ने भी सौरभ है, खूब बिखेरी

पंखड़ी को छूट करके क्यारी में गिरते देखा –

 

कितनी बहारें आईं, कितने बसन्त बीते

फागुन के रंग रंगों नें अगणित धनुष हैं खींचे

काली घटा के झुकते, सावन को रोते देखा

बहारों से ही क्यों पूछो, पतझर को भी देखो

टहनी का रस है सूखा, पत्ते बिछे ज़मी पर

इन पर न भौर गूंजे, ईंधन ही बनते देखा –

 

जीवन के इस सफर में, कुछ मिल गए कोई छूटे

पीछे जो मुड़ के देखा, किसी का पता न आया

गति तीव्र हो गई समय की

खिलता चमन भी देखा, उपवन उजड़ता देखा –

 

थोड़ा समय है बाकी, पाँव बढ़ न पाते आगे

आँखें हुई हैं धुंधली, कानों में राग बजते

समय को पकड़ न पायें, हारे हैं इसके आगे

जो वक़्त आते देखा, वही वक़्त जाते देखा –

 

इन तारकों से पूछो, इतरा रहे क्यों इतना 

जुगनू सी रोशनी से, क्या तम मिटा सकोगे

मत भूलो, याद रखो

सूरज के आने से ही

रातों के जाते देखा –

 

हे ईश ‘याचना’ है, इतना हमें बता दो

कितने कदम हैं बाकी, कितना है और चलना

जप तप तो न है जाना, की न कोई करनी

कितनों से मार्ग पूछा, कितनों ने पथ दिखाया

पर

उस पथ पर चलते जाते कोई भी न देखा –

                             -कमला मायर

(March 1st, 1996, 78th birthday)

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