60. मन का यान
मन का यान-
जब हों रिक्त नयन,
और निश्चेष्ट, शिथिल तन
और अवसाद भरा मन,
मेरा उर पूछ लिया करता है,
प्रभु कहाँ छिपे हो?
कौन से पथ पर चल कर,
मैं दर्श तुम्हारा पाऊँ?
सुना है तुम्हें पाने के मग हैं अनेक
किस किस मग पर कौन चला
यह जानने को
मन व्यग्र हुआ करता है।
कितनों से पूछा, कितनों ने बताया,
अपने अपने ढंग से,
चलने को पग बढ़ाये भी त्वरित,
पर मग के कङ्कड़,
मार्ग की झाड़ियों के कष्टक
सुबने रोके पाँव, सोचा
वे कैसे थे जो चले गए,
क्या काँटे कण्कड़, उनका
मार्ग न रोक सके?
मेरा मन पूछ लिया करता है।
यही सोच सोच कर
हार हार कर जब
एक स्वप्न मन पर छाया,
एक स्वर सा कान में गूँजा
वह मार्ग है ऐसा जिस पर
पाँव नहीं, मन का यान चला करता है।
Found scribbled on the back of this poem:
(मनुष्य निःस्तभ्दता के वातावरण में, एकाकीपन की स्थिति में इश्वर को प्राप्त करने के, उस दिव्य स्वरुप की सत्ता का साक्षात्कार करने के लिए संसार में फैले अनेक मतमतान्तरों के विभिन्न मार्गों पर चल कर परीक्षण करता है -सबसे मार्ग पूछता है- जब मार्ग मिल भी जाता है तो उस पर चलते चलते कठिनाइयों एवं बाधाओं के जो कंकड़ कांटे उसके पावों में घाव करते से दिखने लगते हैं तो वह विस्मित एवं विचलित हो अपने मन में सोचता है कि वे न जाने कैसे थे जो इस मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चल कर अपना अभीष्ट पा गए। तभी उसके अंदर का आत्म तत्व उसके कानों में स्वर फूँक कर कहता है कि इस मार्ग पर पाँव से नहीं, मन से चला जाता है अर्थात स्थूल शरीर के अंगों में होने वाले कष्टों से हटा कर अपने मन को गंतव्य पर ही लगा दो तो यह कष्ट नहीं देते। इसका अभ्यास आवश्यक है।)
-कमला मायर