61. विषयों की आंधी
विषयों की आंधी-
विषयों की आंधी चलती हो
दूरितों की नदिया बहती हो
वह रात अंधियारी होती है
उस समय जो चलकर जाना चाहे
गिर गिर कर उठ उठ कर पैर बढ़ाए
पग पड़ते न कभी आगे
वह बाट कंटीली होती है
न कोई नैया, न कोई चप्पू
चाहे सूरज कितनें निकालें
वह रात न पूरी होती है
-कमला मायर
(Found scribbled on a paper)