64. कोकिलो

कोकिलो-

कोकिलो, मत राग छेड़ो, इस उपवन में,

यहाँ की डालियो का रस सूख चुका है।

हंस मत आना इन सरोवरों में,

यहाँ का जल वाष्प बन कर उड़ चुका है।

इसमें पड़े मोती पथिकों के

चलने से घिस घिर कर

सिकता में मिल चुके हैं,

केवल उनकी कान्ति मात्र

सिकता कणों में चमकती दिखाई दे रही है।

कोकिलो मत राग छेड़ो इन क्यारियों में,

यहाँ के तरुओं से पुष्प झड़ कर,

धूल में मिल चुके हैं।

मत राग छेड़ो व्योम के शून्य पथ पर

यहाँ के कोलाहल में तुम्हारा स्वर,

खो कर रह जायगा।

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आज के यांत्रिक युग में

-कमला मायर

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