65. बिन माँगे देता

बिन माँगे देता-

बिन माँगे देता, अन्न-धन सब सुख,

अवढर दानी है वो महादानी,

पूरण करता सब ही के काम। बिन

पूर्ण भण्डारे हैं नित्य उसके,

होवें न खाली, नित देते देते।

दानी दयालु है जीवों का रक्षक,

सबका है वो ही, एक प्राणदाता।। बिन

वो ही है इन्द्र, वो ऐश्वर्यदाता,

वही सोम है, सब सुख प्रदाता।

विष्णु वही है, वो है सर्वव्यापक

ब्रह्मा वही है, वही शिव रुद्र,

कल्याणकर्त्ता, जगत का विधाता।। बिन

भिक्षा हम उससे, माँगे न माँगे,

अन्तर्यामी वह प्रति मन का ज्ञाता।

मन की भेंट जो लेकर के आते।

उसके भवन को अन्नधन से भरता।। बिन

-कमला मायर