67. नर तन पाकर

नर तन पाकर-

नर तन पाकर जग में तूने क्या काम किया?

क्या ईश ध्याया कभी, क्या प्रभु का नाम लिया? नर-

सुन्दर काया पाई, शुभ कर्मों के करने को,

मन बुद्धि मिले तुझको, प्रभु के गुण गाने को,

मन को घृणा से भरता रहा, बुद्धि से न ज्ञान लिया। नर-

कोमल रसना पाई, कुछ मधुर वचन कहने को,

मृदु कंठ मिला तुझ को, प्रभु के गुण गाने को,

निंदा, चुगली कर कर के, इसको न आराम दिया। नर-

ऐसे जीवन से तो, प्रभु कृपा नहीं मिलती,

चाहे कितना भी चाहें, ज़िंदगी मधुर नहीं बनती,

अमृत झरना बेहटा रहा, खुद तूने विषपान किया। नर-

याचना है प्रभु से, सब सद्बुद्धि पा जायें,

दुर्गुण छूट जांय सभी, तन सेवा में लग जाये,

मन भक्ति से भर जाये, जिसने न अभिमान किया। नर-

-कमला मायर

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