86. बालिका, ओ बालिका

बालिका ओ बालिका-

युग पर युग ,बीतते गए

बालिका के जन्म पर, हम सदा रोते रहे,

चन्द्रमा से एक शिशु ने

पास के घर को किया रोशन,

आने लगीं बधाइयाँ,

बँटने लगीं मिठाइयां,

बजने लगीं शहनाइयां,

ढोलकों के, गीतों के स्वर,

नभ में गूँजते गए।

इधर, तारिका सी इक मृदुल बालिका ने,

लिया धरती पर पहला श्वास,

छा गया मातम!

उदासी ने किया घर!

खींच लम्बी सांस

कहा (सबने),

यह है पराया धन,

एक धरोहर, एक क़र्ज़,

इसको चुकाने के लिए,

बेहद करना होगा श्रम,

और तब,

परिवार के खर्च पर चलाई तेज़ कैंची,

भूख, बीमारी, गरीबी की यातना,

खींच लाई नर्क को धरा पर,

वो मूक हो सब सहते गए।

चन्द्रिका सी बढ़ी बालिका,

और पिता,

घर की सब पूंजी समेट,

उजला, काला धन जुटा,

वर खोजने निकले,  तो साथ में

दहेज़ की एक लम्बी लिस्ट भी लेते गए।

पहुंचे तो, वर पिता ने, भौं सिकोड़ी,

और तड़क कर कहा

ऊँट की प्यास बुझाने, क्या ओस बिंदु लेकर निकले?

लौट कर,

रखा मकान गिरवी पर,

पेट भरा दहेज़ दानव का

कर बिदा बेटी को, सब

हाथ मलते रह गए।

पर फिर,

एक कार की कमी ने,

नव वधु के हाथ की मेहंदी, सिन्दूर की सुर्खी

को किया तेल के घुएं की ज्वालाओं की

कालिख से मलिन,

बालिका का भस्म चेहरा देख,

यमराज भी बचकर चलते गए।

माता पिता,

छटपटाते, बिलबिलाते, लड़खड़ाते,

उठा बाला का शेष तन,

सोचते, जांय शमशान या अस्पताल?

ये है, वधू दाह, या आत्मदाह?

परिवार के क्रंदन के स्वर,

अरण्य रोदन बन कर रह गए।

क्या यही है अंत, बालिका के जीवन का?

क्या इसी लिए लिया कर्ज़, ली रिश्वत?

क्या विवाह है मानव के मन का, या धन का?

ये प्रश्न मन पर हथौड़े की तरह बजते गए।

पर उन्हें,

डर है न कानून का,

भय न है समाज का,

लाज को रख पाप के रथ पर,

लोभ, हिंसा की लगा चाबुक,

बीच बाज़ारों से,

दूसरी बारात ले, बेधड़क गुज़रते गए-

-कमला मायर

1991

Scroll to Top