Dr. Kamala Mair, PhD (1918-1998)
First Principal of D.A.V. College for Girls, Yamunanagar
Poet, author, philosopher, Vedic scholar, classical musician, and advocate for women's empowerment
"In fact, a book can be written about respected Dr. Mair's character and work....She is a pure hearted and simple natured scholar who is always at the forefront for awakening of society." -1997
(Translated from Hindi)
- Acharya, Pandit Usharbuddh
Vedic scholar and speaker (Rajasthan)
शिक्षेयमस्मै दित्सेयं शर्चीपते मनीषिन्ने यदहं शोर्पतिः स्याम् - ऋग्वेद, सामवेद
Eminent scholars and colleagues pay tribute to Dr. Kamala Mair and her writings.
About Dr. Mair
1. Dr. Mrs. Shyama Sharma, Retd. Principal, Vaish College, Rohtak, and Dr. Mair’s young colleague 50 years ago (1965-71), remembers her fondly:
2. Dr. K. L. Johar, former Vice Chancellor, GJU Hisar, Pro Vice Chancellor, Kurukshetra University, who was a professor at MLN College, Yamunanagar in 1960's remembers Dr. Kamala Mair:
About Dr. Mair's writings:
- About Yaachna booklet
- आचार्य पं. उषर्बुध
इस संसार में वर्तमान काल में कई प्रकार के साधन हैं जिनके द्वारा मनुष्य स्वयं या अन्यों को उपकृत करता है। वह ईश्वर इतना महान हैं कि उसकी महानता का वर्णन कोई भी नही कर पाया है समय-समय पर विद्वानों ने, कवियों ने, महात्माओं ने उस प्रभु की महानता का बखान किया है। सुयोग्य विद्वान लेखकों एवं कवियों ने तो पूरे संसार को झकझोर कर रख दिया है। कवित्व तो ईश्वरीय देन है। जीवन में मुझे बहुत से कवियों की रचनाएं देखने को मिली हैं परन्तु प्रस्तुत रचना संग्रह अपने आप में विशिष्टता रखता है। उत्तम रचनाएं वो होती हैं जो शब्द रचना के साथ-साथ विशेष शिक्षा भी देवें। मान्या माता जी (डा0 कमला मायर) जी का यह सुप्रयास इतना अच्छा है कि मनुष्य आलस्य और प्रमाद को छोड़कर ईश भजन करने लगेगा। कवि रचना तो बहुत करते हैं परन्तु मान्या माताजी ने कतिपय वेद-मंत्रों का आधार लेकर भी रचनाएं की हैं जैसे शिव संकल्प मंत्र ‘उदयानं ते पुरुष’, 'अश्मन्वतीरीयते सरभत्वं', जो कि विद्वतापूर्ण भावों को भी व्यक्त करती हैं। मान्या माताजी के हदय की यह पुकार हैं कि ‘सन्धया से निशा की ओर’ जाते हुए ईश भक्ति में खोकर अमृत पान करना और कराना। मैंने माता जी के सुमधुर भजनों एवं काव्य रचना संग्रह को अधोपान्त पढा है। मुझे एक-एक पंक्ति ने बड़ा ही रसास्वादन कराया। माता जी की यह कृति प्राणिमात्र के लिये वरदान सिद्ध होगी, चुंकि यह केवल शब्दों का संग्रहमात्र नहीं है, यह तो अन्तर्हृदय की पुकार है । किसी कवि ने कहा हैं “इन्हें आँसू समझकर यू न मिट्टी में मिला डालिये, पयामे दर्दे दिल है और आंखो की जुबानी है।“ मेरा समस्त जनों से विशेष अनुरोध है कि इस कृति को हदय से पढ़ें तभी मान्या माता जी का परिश्रम सफल होगा। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि मान्या माताजी स्वस्थ और निरोग रह कर समाज सेवा को सदैव संलग्न रहे।
विदुषामनुचर आचार्य पं. उषर्बुध
वैदिक प्रवक्ता
मु0 पत्रालय-चिरानी
झुंझनू (राजस्थान)
2. -श्री जगन्नाथ जी कपूर
(About Yaachnaa booklet)
प्रिय बहन जी डा0 कमला मायर द्वारा विरचित भजनों की प्रस्तुत पुष्प वाटिका को पढकर मैं आनन्द से विभोर हो उठा। बहन जी लिखने व पढ़ने में विशेष रुचि रखती हैं और धार्मिक विचारों वाली महिला हैं। यह पुस्तिका उनकी अध्ययन-शील प्रकृति एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति की परिचायिका है। मन की शुद्धता, साधना एवं एकाग्रता के फलस्वरुप ही पवित्र संगीत की ज्योति प्रज्जवलित होती है। संगीत तक ऐसा साधन है जिससे मनुष्य अपने मन दर्पण को शुद्ध करके प्रभु का सामीप्य अनुभव करता है। शास्त्रों के पठन-पाठन के लिये विशेष समय व स्थान की आवश्यकता होती है और उससे भी बढ़कर विशेष प्रतिभा की आवश्यकता होती है परन्तु भजनों के माध्यम से साधारण से साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति भी किसी भी समय अथवा स्थान पर प्रभु-चरणों में अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित कर सकता है।
प्रस्तुत संग्रह की कई रचनाएं वेदमंत्रों पर आधारित हैं जो सोने पर सुहागे का कार्य करती हैं।
आशा है पाठक वर्ग इस उत्कृष्ट कृति से अवश्य लाभान्चित होगा। अन्त में मैं परम पिता परमात्मा से यही प्रार्थना करता हूं कि बहन जी दीर्घायु हो और इसी प्रकार समाज कल्याण के पथ पर अग्रसर रहें।
जगन्नाथ कपूर
प्रधान डी.ए.वी. संस्थाएं
यमुना नगर
उप-प्रधान आर्य प्रादेशिक
प्रतिनिधि सभा दिल्ली
- About Vandanaa booklet
1. शशि भूषण सिंहल
डा. (श्रीमती) कमला मायर विदुषी समाज सेवी हैं। एक प्रतिष्ठित कॉलेज की दीर्घकाल तक प्रिंसिपल रहकर उन्होंने अवकाश ग्रहण किया हैं। फिर भी, उनके कर्मठ व्यक्तित्व को अवकाश कहाँ? वे अनवरत लेखन-अध्ययन, आर्यसमाज और समाजिक गतिविधियों से जुड़कर हरदम सक्रिय हैं। जिन्होंने उन्हें निकट से देखा हैं उनकी सहज स्नेहशीलता के पाश से मुक्त नहीं हो पाते। वे बौद्धिक होने के कारण चिन्तनशील हैं, किन्तु मन की गहराइयों से सह्रदय भक्त हैं। वे आर्य समाज की दृष्टि से ईश्वर को निराकर रुप में पाती हैं परन्तु किसी तर्कजाल में उलझती नहीं। प्रभु उनके निकट सर्वशक्तिमान पिता हैं जिसे वे पूजती हैं, उनका पूजक मन गा उठता हैं-
“दाता तुम हो, विधाता तुम हो,
हम हैं तुम्हारे द्वार के याचक।“
-----------------------------------------
“चलते चलते पांव थके हैं,
प्रभु बता को कितना हैं चलना ?”
समर्पित मन के उद्गार काव्य-नियमों की व्यर्थ चिन्ता नहीं करते। उन्हें केवल एक चिन्ता हैं, प्रभु से हार्दिक संवाद स्थापित करने की।
उन्होंने अपना अनुभवसार इन शब्दों में अच्छा बतलाया हैः- ‘उस सूक्ष्म एवं कोमल स्पर्श की अनुभूति के लिये तनिक, जग की जगमगाती चौंध से मुंह फेर कर पल भर आंख मूंदकर अपने अहं को भुला देना सर्वोत्तम उपाय हैं।‘
कामना हैं, डा0 कमला मायर स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें और अपनी पुष्पांजलि की साधना और सहज वाणी से हम सबको प्रेरित करती रहें।
शशि भूषण सिंहल
(म.द.वि. विद्यालय रोहतक के हिन्दी विभाग एवं डीन ऑफ कालेजिज़ के पद से अवकाश प्राप्त/सम्प्रति यू.जी.सी. प्रोफेसर एमेरिटस फैलो के रुप में मान्य)
2. (सरस्वती) सुधा डालमिया
मुझे अपनी प्रिय सखी, बहन कमला की प्रस्तुत कृति की पाण्डुलिपि पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। एक-एक पन्ना बड़े चाव से पढ़ गई- कई स्थलों की पुनरावृति भी की।
सर्व प्रथम तो इनका ‘नम्र निवेदन’ ही अत्यन्त मनोरम एवं कवित्व के उत्कृष्ट भावों से परिपूर्ण है, शब्दावली भी सम्यक् सशक्त है। मुझे रह-रहकर हम सबके गुरुजनों की याद आ रही थी जिनकी कृपा से हम सबका देववाणी संस्कृत एवं हिन्दी भाषा का ज्ञान परिपक्व एवं उत्तरोत्तर उन्नत होता गया । काश वे लोग आज हमारे बीच उपस्थित होते तो अपनी सबसे होनहार शिष्या कमला मायर की ऐसी सुन्दर कृतियों पर उन्हें नाज़ होता। अस्तु उनके आशीर्वाद तो सदा हमारी कमला के साथ ही हैं, मेरी भी हार्दिक शुभ कामनाएं इनके साथ हैं। इनकी ईश-भक्ति भाव से ओतप्रोत कविताओं एवं भजनों में एक सच्चे भक्त ह्रदय की टीस है एवं एक बड़ी लोक कल्याण की भावना का सतत अजस्र प्रवाह है जिसकी अनुभूति प्रत्येक संवेदनशील पाठक को इन रचनाओं को पढ़ते समय ही होती चलती हैं।
जितना अधिक मेरा मन इन रचनाओं में रमता है उसकी गहराई की यथार्थ अभिव्यक्ति मैं भाषा में नहीं कर पा रही हूं। कहीं पर लगता है ये एक सच्चे भक्त ह्रदय के बड़े सीधे सरल भाव अपने आप प्रवाहित होते चले जा रहे हैं। वैदिक मंत्रों के अर्थ आधुनिक जीवन की बोधगम्य शैली में समझाने का सच्चे ह्रदय से प्रयास विशेष रुप से स्तुत्य है। कई स्थल अत्यन्त मार्मिक बन पड़े हैं जैसे,
“उत्सुक हूं
उत्कंठित हूं
व्याकुल हूं"
-----------------------------------------
"नेत्र पटल पर की दोपहरी
अब संध्या का रुप धर रही
कितने पल, कितने क्षण
दिवस मास और वर्ष,
अब रुप निशा का पाकर
विश्राम प्रदान करेंगे
जिससे मानस पट पर
नव प्रभात के पुष्प खिलेंगे”
इन पंक्तियों में मानव जीवन की बढ़ती अवस्था का चित्रण अत्यन्त प्रभावशाली हैं।
और भी,
“अवसाद के वे क्षण अत्यन्त मधुर एवं मूल्यवान होते हैं जो मनुष्य को आध्यात्मिकता, प्रभु विश्वास एवं भक्ति की ओर अग्रसर करते हैं।“
ऐसे ही अनेक स्थल इस रचना से उद्धत किये जा सकते हैं जो जीवन के सत्यों का बड़े मार्मिक ढंग से उद्घाटन करते हैं।
अन्त में उन परम कृपालु प्रभु के श्री चरणों में मेरी विनीत प्रार्थना हैं- मेरी परम प्रिय सखी कमला को सुन्दर स्वास्थ्य के साथ दीर्घायु प्रदान करे जिससे वह स्वयं सात्त्विक आनन्द में मग्न रहकर अपनी ऐसी सुरचनाओं द्वारा जगत का उत्तरोत्तर कल्याण करती रहें।
सस्नेह
(सरस्वती) सुधा डालमिया
Poet, scholar and Dr. Mair's childhood friend
(डालमिया निवास-देहली)
3. (परमहंस) स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
मैने श्रीमती कमला मायर जी के गीतों और वेदमंत्रों के काव्यनुवादों की पाण्डुलिपि का अवलोकन किया। गीत उत्तम हैं, वैदिक सिद्धान्तों के अनुकूल हैं। उनमें गेयता हैं। इन भजनों को गाने से साधक में प्रभु-प्रेम जाग्रत होगा, ह्रदय तंरगित और उल्लसित होगा। मैं इस कृति के लिए उन्हें साधुवाद देता हूं। वे अपनी साधना को जारी रखें।
शुभकामनाओं सहित
(परमहंस) स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
4. (आचार्य पं) उषर्बुध
डा0 कमला मायर जी की ‘याचना’ नाम से एक सुन्दर भक्ति रचना के पश्चात् अब ‘वन्दना’ शीर्षक से भक्ति-भावपूर्ण प्रस्तुत रचना प्रकाशित हो रही हैं। उसके विषय में अपने विचार प्रगट करने में मुझे हर्ष हैं अतः संक्षेप में ही लिखकर रचना की कुछ विशेषताओं पर प्रकाश डाला जा रहा है। वास्तव में मान्या डा. कमला मायर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर तो अपने आप में ही एक पुस्तक बन सकती है।
विश्व के किसी कोने में कोई समस्या उत्पन्न होती है तो उसका प्रभाव विश्वव्यापी होता है, इसी प्रकार उसके समाधान का प्रभाव भी क्यों न होगा ? समस्या की तरह समाधान भी देश और काल की सीमाओं में आबद्ध नहीं रहता। किन्तु वर्तमान युग की स्थिति विचित्र है। इस समय ऐसे वयक्ति कम दिखाई देते हैं जो समस्याओं से आहत होने की बजाय उनका समाधान खोज सकें और युग के प्रभाव को मोड़ सकें। उत्तम कोटि के साहित्य से सम्पूर्ण समाज का स्वरुप निखर जाता है। लेखक अपनी लेखनी से, वक्ता अपने वक्तव्य से, विद्वान अपनी विद्वत्ता से, सदाचारी अपने सदाचार से विश्व भर को सदैव प्ररेणा देते रहते हैं। इस दिशा में ‘वन्दना’ लेखिका की अत्यन्त सराहनीय सुकृति है। निश्चय ही इसमें लेखिका के गद्य-पद्य भाग अति सुन्दर तरीके से संजोये गए हैं। लेखिका वास्तव में पवित्र-ह्रदया, विदुषी, सरल स्वभाव से युक्त और समाज की जागृति हेतु सदैव अग्रणी रहती हैं।
महाभारत में कहा गया है:-
सुव्याह्रतानि सूत्कानि, सुकृतानि ततस्ततः।
सञ्चितवन् धीर आसीन् शिलाहारी शिलंयथा।।
अर्थात् धैर्यवान् मनुष्य उत्तम प्रकार से प्रगट की गई सूक्तियों एवं पुण्य कर्मों का जहां तहां से उसी प्रकार संचय करता है जैसे वनस्थ (खेतों में सब ओर से ) गेहूँ आदि की बालियों का संग्रह करता हैं।
‘वन्दना’ में लेखिका की स्वरचित गद्य-पद्य-मय रचनाएं उत्तम भावों से परिपूर्ण हैं। पाठक उनका उसी प्रकार संचर करें।
मेरी प्रभु से प्रार्थना हैं कि मान्या माता जी (डा. कमला मायर) इसी प्रकार प्रभु का गुणगान करती हुई वर्तमान दयनीय समाज की सेवा में संलग्न रहें। कामना है कि वे निरोग और स्वस्थ रहकर भविष्य में भी समाज को प्ररेणा देती रहें।
मुझे पूर्ण आशा हैं कि पाठक ‘वन्दना’ का ह्रदय से स्वागत करके लाभान्वित होंगे।
(आचार्य पं) उषर्बुध
विदुषांवंशवदः।
वैदिक प्रवक्ता
झुंझन(राजस्थान)
5. डा. विद्या भूषण तनेजा
वे व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली हैं जो अपने अध्ययन, अनुभवों और परम पिता परमात्मा की अनुकम्पा से प्ररेणा प्राप्त करके जीवन में लक्ष्य की ओर अग्रसर होकर समाज सेवा में लगे रहते हैं। परन्तु उनमें से भी वो व्यक्ति जो प्ररेणा पाकर प्ररेणा के स्त्रोत बन जाते हैं, अधिक भाग्यशाली होते हैं। वे अपने भाषण और लेखन द्वारा औरों को प्रेरणा देने में सफल होते हैं। उन गिने चुने व्यक्तियों में एक नाम हैं डा. कमला मायर का। वे एक अध्ययनशील विदुषी हैं जो अध्ययन के अतिरिक्त अध्यापन से प्रेरणा पा कर एक प्ररेणास्त्रोत बन गईं। वे यमुनानगर के प्रतिष्ठित डी.ए.वी. कॉलिज की दीर्धकाल तक प्रिंसिपल रह कर लगभग 16 वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हुई। वैदिक विचारों से ओतप्रोत तो थी हीं, डी.ए.वी. ससंथा से जुड़कर उनके विचार वरिपक्व हो गये। सदैव आर्य समाज के कार्यो एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने से उनका व्यक्तित्व और निखरा। अपने अध्यापन काल में, सहस्त्रों छात्राओं, उनके अभिभावकों और अन्य गण्यमान व्यक्तियों को प्रभावित करके उनके जीवन पर जो अमिट छाप उन्होंने छोड़ी होगी उसके लिये वे सदा उनके आभारी होंगे।
सेवानिवृति के पश्चात् जब से वे गुड़गांव में रह रही हैं उन्होंने अपने समाज-सेवा कार्य को और अधिक विस्तृत किया है। विगत कई वर्षों से स्त्री आर्य समाज अर्बन एस्टेट (गुड़गांव) की प्रधाना के रुप में भाषण लेखन के अतिरिक्त निर्धन बालिकाओं के लिये एक सिलाई केन्द्र की स्थापना की, जिसमें प्रशिक्षण पाकर सैकड़ो बालिकाएं एवं महिलाएं अपने पैरो पर खड़े होने योग्य हो चुकी हैं। अपने अनथक प्रयासों से कई मशीनें दान रुप में जुटाईं। उनके सामाजिक कार्यों को देखते हुए गुड़गांव सैक्टर 17 के सोनियर सिटिजन फोरम ने दो वर्ष पूर्व उन्हें सम्मानित किया, जो कि उनके जीवन की बड़ी उपलब्धि है। अब उनहोंने अपने भक्ति-भाव-पूर्ण प्रेरणा दायक विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पुस्तक लेखन का कार्य किया है। दो वर्ष पूर्व उनकी भक्ति गीतों/कविताओं की पुस्तिका ‘याचना’ शीर्षक से प्रकाशित होने के पश्चात् अब प्रस्तुत गद्य-पद्य मय रचना ‘वन्दना’ शीर्षक से प्रकाशित हो रही है। इस चिरस्थाई कार्य के लिये वे धन्यवाद की पात्रा हैं । वैदिक विचारों से ओतप्रोत यह रचना सरल, सुन्दर एवं उत्तम शैली में प्रणोत है। इसको पढ़कर पठकों के मन मे अवश्य भक्तिभाव जाग्रत होगा। इस प्रयास के लिये मैं उनको शुभकामनाएं देता हूँ। परम पिता से प्रार्थना है कि वह इन्हें दीर्घायु एवं स्वास्थ्य प्रदान करें और वो भविष्य में और भी अधिक प्ररेणादारयक कृतियों को प्रकाशित करें। किसी भी लेखक का सब से बड़ा उपहार होता है उसके विचारों का असंख्य व्यक्तियों तक पहुंच कर उन्हें पूर्णतया लाभान्वित करना। प्रभु उनकी इस कामना को पूर्ण करें।
डा. विद्या भूषण तनेजा(गुड़गांव)
Retd. H.E.S.I.
Retd. Director State Council of
Research and Training(Haryana)
Excerpts from a few condolence notes upon Dr. Mair’s death in May 1998:
1. From D.A.V. College for Girls, and D.A.V. Polytechnic for Women, Yamunanagar:
“…Revered Mrs. Mair had served the institution over long years with a consistent sense of owning and dedication. During her years of active service and again of retirement Mrs. Mair proved to be a multi-faceted personality who kept herself busy and involved in multifarious activities. She was deeply devoted to the cause of women’s uplift and actively associated herself with women’s organizations given to the cause. She was a great Hindi lover and organized many functions here as also outside for the promotion of our national language. She was earnest in her quest for truth and spent long regular hours in the study of our sacred scriptures……Untimely death of her husband landed her in a real difficult situation at home front, but she rode through the ordeal with distinctive achievements to her credit. Her association with these institutions in Yamunanagar continued to be regular and constant even after her going to settle down in a different city……”
2. From Mahajan Lok Kalyan Sabha, Yamunanagar:
“….She (Mrs. Mair) was a noble lady, who was the first Principal of D.A.V. College for Girls, and whatever edifice we see today was built brick by brick by her. She was humane, religious minded and full of love and affection not only for her children but for all the students she had under her wing. It is really impossible to fill her place….”
3. From Mukand Lal National College, Yamunanagar:
“….The passing away of Dr. (Mrs.) Kamala Mair ji is a great loss not for the family but for Seth Jai Prakash Mukand Lal institutions of knowledge and service as a wholewith which she was associated for a very long time…..”
4. From Vishwas Sangeet Parishad, Yamunanagar:
“….आप हमारी परिषद् की कुशल एवं सक्रिच संरक्षिका थीं। संगीत कला से आपको बहुत लगाव एवं अनुराग था। यमुनानगर/जगाधरी में संगीत कला का प्रचार-प्रसार करने में आपका विशेष हाथ रहा है। आपने हरयाणा संगीत कला केंद्र की स्थापना की थी। 'पाठक संगीत मंदिर' एवं 'विश्वास संगीत परिषद्' को आपका सहयोग जीवन के अंतिम क्षणों तक मिलता रहा। आप एक अच्छी लेखिका और कवियत्री भी थीं। आपके निधन से जो स्थान खाली हुआ है उसकी पूर्ति असंभव है।….”
5. The late Mrs. Saraswati Dalmia ji (wife of the famous Industrialist of India, the late Mr. R.K. Dalmia ji) and Dr. Mair were childhood friends, and remained close till the end. They were the only two Hindu students at I.T. (Isabella Thoburn) College in Lucknow. In her later life, Mrs. Dalmia, who was a Hindi and Sanskrit poet and scholar, published a book titled Neerajana, which had beautiful poems written by her in both languages. At the end of the book she paid tribute to a few important people in her life. Under the friend category she wrote a very affectionate chapter about Dr. Mair. Some of her memories are included here:
मेरी बाल सखी, अति प्यारी मित्र स्व. डॉ कमला मायर
अचानक मेरी प्यारी बाल सहचरी श्रीमती कमला मायर के स्वर्गवास का समाचार कमलाजी के सुपुत्र डॉ दिवाकर से टेलीफोन पर सुनकर मन को बड़ा भारी धक्का लगा। बहुत देर तक मन को विश्वास ही नहीं हो रहा था। अरे वह अदम्य साहस से भरी, सेवा की साक्षात मूर्ति, सदा सबकी सहायता के लिए तत्पर-वह मेरी निकटतम सहेली सहसा मौन कैसे हो गयी? यह तो उसका स्वभाव नहीं था।--- बेटे दिवाकर से सुना कि अपने स्वर्गवास के एक दिन पहले भी वह आर्य समाज महिला सभा में गयी और वहाँ गरीब स्त्रियों के सलाई इत्यादि के काम को सम्भाला। उन्होंने कई सिलाई मशीनों का प्रबंध धीरे-धीरे कर लिया था, जिसपर सीने का अभ्यास करके महिलाएं स्वावलम्बी बन सकें। कभी-कभी उन महिलाओं के सिलाई- कढ़ाई के काम की वे exhibition भी करती थीं जिससे प्रोत्साहित हो कर अधिकाधिक महिलायें अपने काम में रूचि लें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
हमारे महिला विद्यालय स्कूल एवं कॉलेज (लखनऊ) की कमला के साथ स्मृतियों का प्रभाव मेरे मन में हठात बहने लगा। स्कूल की Girls Guide teacher Mrs Scots मेरी प्रिय बेहेन कमला के सबको मदद करने वाले स्वभाव से सदा प्रसन्न रहती थीं। कमला उस समय छोटी कक्षाओं की विद्यार्थीं थी। कमला को Girls Guide teacher ने अपने से next monitress की पदवी दे राखी थी और कमला के स्कूली जीवन के बाद भी ये टीचर उन्हें सदैव बहुत मानाती रहीं।
प्रिय कमला की helpfulness की स्वयं अपने साथ घटित कुछ घटनाएं मुझे बहुत याद आ रही हैं। एक बार कक्षा में पहुँचने की जल्दी में मैं अपना बस्ता लिए भाग रही थी कि अचानक मेरा बस्ता खुलकर के मेरी साड़ी किताबें, कॉपियां, कलम-पेंसिल दूर दूर तक बिखर गए। एकदम घबरा कर मैं रूओसी में किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी थी कि भागती हुई कमला आयी और स्वयं कक्षा में पहुंचना भूलकर मेरा सब बिखरा हुआ सामान तड़ित गति से समेट दिया और मुझे संभालकर बोली-"अब रोओ मत और तुरंत कक्षा में पहुँच जाओ।"
इसी प्रकार एक बार हम सब विद्यार्थियों की रामायण की मौखिक परिक्षा थी। जो teacher हम लोगों को one by one बुलाकर हमारी परीक्षा ले रहे थे उनसे मैं बहुत घबरा रही थी। मेरी घबराहट देखकर कमला ने मुझे हिम्मत बंधाई कि चलो, मैं teacher से पूछ लेती हूँ, तुम teacher के पास मौखिक परीक्षा देती रहना, मैं तुम्हारे पीछे कुछ दूर पर बैठी रहूंगी। और सचमुच कमला की उपस्थिति से मुझे बहुत साहस मिला और मैं उस परीक्षा में अच्छीतरह सफल हो गयी।
मेरी कमला परम विदुषी महिला थीं। कॉलेज जीवन में भी मैं और कमला ही कॉलेज की पत्रिका "आशा" को संभाल रहे थे। मैं उस पत्रिका के हिंदी और संस्कृत विभाग की सम्पादिका थी और प्रिय कमला इंग्लिश विभाग की सम्पादिका थीं। जब हम दोनों ने क्रमशः संस्कृत एवं हिंदी में एम् ए कर लिया तो हम सब सहपाठियों को यह जान कर बड़ा गर्वोल्लास हुआ कि हमारी कमला ने तीन वर्ष की अवधि में पी एच डी भी कर ली -हमारे बैच में अकेली कमला ने ही पी एच डी की थी। इसका हम सबको ही बड़ा गरिमान्वित आनंद होता था। मेरी कमला एक बड़ी अच्छी शास्त्रीय संगीत की ज्ञाता भी थी। उसके मौखिक ज्ञान की हमारी weekly कुमारी सभा की stage पर सबको आनंदित करती थी। साथ ही उसे जल तरंग नामक वाद्य का भी बहुत सुन्दर अभ्यास था। मैं समय-समय पर याद दिलाती- कमला जल तरंग का अपना इतना सुष्ठु अभ्यास भुलाओ मत।
इसके साथ ही हमारी कमला एक परम विदुषी शिक्षिका और लेखिका भी थीं। हरयाणा के एक विख्यात D.A.V. College for Girls की प्रधानाचार्य का पद उनहोंने बड़ी सफलतापूर्वक निभाया। उनके प्रधान अध्यपिका काल में ये कॉलेज खूब उन्नति करता रहा और इसके विद्यार्थी शिक्षा विषयक सभी क्षेत्रों में बहुत नाम अर्जित करते रहे तथा अध्यापिका वर्ग भी बहुत अपनत्व और उत्साह से बच्चों के सर्वागीण विकास में संलग्न रहा। सेवानिवृत्त होने पर भी कमला का अपनेपन का नाता सदैव इस कॉलेज से जुड़ा रहा।
कॉलेज से अवकाश प्राप्त करने के बाद कमला ने इश्वरभक्ति सम्बन्धी कई सुन्दर, सरल गीत एवं गद्य काव्य लिखे, जिन्हे उन्होंने 'याचना' एवं 'वन्दना' नामक दो ग्रंथों में संकलित किया है। इन दोनों ग्रंथों को उन्होंने बड़े चाव से मुझे भी भेजा और मेरी सम्मति भी मांगी, जो मैंने जैसी मुझसे बनी, उन्हें लिख भेजी और उन्होंने बड़े-बड़े धुरंधर विद्वानों की सम्मति के साथ मेरी सम्मति को भी 'वंदना' में सम्मिलित कर लेने का सौभाग्य मुझे आयाचित ही प्रदान किया।
अन्ततः मैं के कहूँ, उनसे विलग होने का यह दुःख जीवन भर मुझे कातर करता रहेगा, पर ह्रदय से यही ध्वनि निकलती रहेगी- उनकी आत्मा को भगवन अपने कृपालु चरणों में चिर शांति देवें तथा उनकी अधूरी इच्छाओं को उनकी प्रिय संतति पूरी करती रहे।
पुनष्च : मेरी प्यारी बहन कमला ने ही मुझे वेद के महामंत्र श्री गायत्री मंत्र की वास्तविक महिमा समझाते हुए कहा था-सुधा ऐसा न समझो कि श्री गायत्री महामंत्र केवल दिन में ही जप सकते हैं और रात में नहीं जप सकते हैं। यह महामंत्र तो हम सोते-जगते तथा मध्य रात्रि में भी नींद खुलने पर भी जप सकते हैं। इसके बराबर शक्ति एवं सहारा देने वाला कोई मंत्र नहीं है।
मुझे याद आता है कि मेरे पतिदेव भी जब-जब मेरी सखी से मिले तब उनकी लोक-कल्याणकारी भावनाओं से बहुत प्रभावित होते रहे और मेरे पति के स्वर्गवास के बाद मेरी परम सहृदया बहन कमला ने मेरे पतिदेव की उदात्त सहृदयतापूर्ण भावनाओं, उनकी परदुखकातरता, परोपकारिता के प्रति अपनी श्रद्धांजली अर्पण करते हुए जो स्मृति लेख मुझे भेजा, उससे मुझे बड़ी सांत्वना मिली और मैंने वह लेख अपने पतिदेव श्री रामकृष्ण डालमिआ के स्मृति-ग्रन्थ में बड़े आदर से छपवा दिया।
-(Saraswati) Sudha Dalmia
Poet, scholar and Dr. Mair's childhood friend
(Dalmia Niwas, Delhi)