5. मन मंदिर

मन मंदिर

मन मंदिर में दीप जला दो

घोर तम छाया है इसमें

इसको क्षण में दूर भगा दो

तेज़  झंझावात चल रहा

दीप शिखा हिलने न पाये

नैनों के पट बंद कर दो

ज्योति जगमग फैल जाये

शत्रुओं ने घेरा डाला

द्वार सारे खटखटाए

ज्योति उज्जवल बुझ न पाये

दो पुतलियाँ प्रहरी बना दो

बाहर शत्रु भीतर प्रीतम

दे रहा जो हमको सहारा

मूंदे नयन की ज्योति लेकर

ढूंढ लो वो दिव्य संबल

दीप को जो स्थिर बना दे।

-कमला मायर

 

Scroll to Top